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मैं क्या करूँगी?
पंचायत में किसकी जीत होगी,
अपने आप पर भरोसा रखें,
मुंशी छक्कनलाल बौखलाये से घर में गये और
सिद्धेश्वरी हठात चुप हो गई।
महीना भर के बदले दो महीना जोत लो। और क्या लोगे ?
और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था.
मुखर्जी ज़्यादा देर नहीं रुका।
कुछ में बड़े अक्षर थे|
बाहर से कोरियोग्राफर और फोटोग्राफर बुलाए गए थे।
'तुम मेरे सबसे अच्छे पोते हो।'
स्कूल से घर लौटते हुए रास्ते में,
यदि मैं आज दफ्तर में आकर अपनी पत्नी के आय-व्यय और
वे सीधे पेड़ की ओर बढ़े।
हमने अभी-अभी स्कूल की सर्दियों वाली वर्दी बाहर निकाली है।
पुक-पुक आवाज सुनाई दे रही थी
के दौरान ही गांधी ने
इंडियन कांग्रेस की स्थापना की.
दूसरे ही क्षण प्रभात की किरणों में बुधगुप्त का
रोटी खाओ और अल्लाह का नाम लो।
लोग अपने घरों से बाहर निकल आए।
मां.. भगवान ने मुझे क्यों इतना काला बनाया है?
हामिद दूर खड़ा है.
पक्ष तो पहले से ही निर्बल था।
कन्याकुमारी में केवल एक तीर्थस्थान है बल्कि
मोहनदास करमचंद गांधी के पिता,
दो मछलियाँ सामने से तैरती हुई निकल गयीं, एक पतली और दूसरी गोल।
नहीं तो पहले मुझी को विष खिला दो।
न हारमोनियम पर गा सकती थी।
यह आयन एक दूसरे की ओर आते हैं ओर इसी से बिजली पैदा होती है-
दु:ख-सुख के प्रत्येक अवसर पर
मुंशी जी ने सावधानी से जवाब दिया-यह तो
चौक पूरना आदि कहा जाता है।
मीनू की आवाज में बुलंदी देखकर मां समझ गई कि उसका इरादा पक्का है उन्होंने उसे ना नहीं कहा।
अरे मुझे क्या बेचेगा रुपैया
चकनाचूर अब नीचे गिर कर,
उसी तरह नदी की काली सतह पर तारे झिलमिला रहे थे।
'चलो बाज़ार से तुम्हारे लिए कुछ लेकर आते हैं।'
जितना दुष्कर समझते थे,
सोती हुई लहरों में कुछ हलचल हुई और फिर सन्नाटा हो गया।
सिद्धेश्वरी ने चौके की ओर भागते हुए उत्तर दिया,
और रुलाई भी बू हू !
बारिश की मूसलाधार बूँदें जब उस पर ज़ोर-ज़ोर से पड़ती हैं,
‘तीन पैसे दिए.’
यह निर्णय करना असम्भव था कि
दादाजी को पेड़ों की रक्षा क्यों करनी चाहिए?
अगर तुम मेरे साथ जाओगे तो बिन्नी को कौन देखेगा?
पर आज वह बग्घी कालदेव के समान भयंकर मालूम हुई।
दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों
शिक्षक को कुछ राहत मिली और
'बुधगुप्त! आज मैं अपने प्रतिशोध का कृपाण
अब बेचारी खालाजान को प्रायः नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं।
'तुम लोग कितने अच्छे हो। कितने दयालु हो।
श्
जिन्हें कोलम, मोग्गु, रंगोली, अल्पना, हासे चित्तरा,
वह गॉँव लिया तो था तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?
एक जंगल में बरगद का पेड़ था.
मोहसिन के पास एक, दो, तीन,
मोटा राजा व दुबला कुत्ता घूमने निकले।
तब जो आवाज़ होती है,
से भारत दुनिया का
पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।
सभी बच्चे जोर जोर से ठहाके लगाने लगे उसे देख कर हंसने लगे और
गुडुब! चोरू पानी में गिर गया।
कि वो रेलवे के तीसरे दर्ज़े के डिब्बे में
एक साथ मिलाओ या अलग कर दो।
मैंने अखबार उठा कर देखा तो एक फ्लैश खबर थी, 'वृक्षों के लिए लड़ाई!
भी भरोसा किया जाए तो वह
चारों तरफ कोलाहल मच रहा था।
जब घायल हुआ हिमालय
जिस तरह कलुषित हृदयों में कहीं-कहीं धर्म का धुँधला प्रकाश रहता है,
यहाँ के आदिवासियों की
बिंब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा,
और उसे पार कर गए तो ज़िन्दगी बहुत आसान हो सकती है।
एक-एक प्रश्न जुम्मन के हृदय पर हथौड़े की चोट की तरह पड़ता था।
अब मैं अपने जबड़ों को चबाते हुए सुनना चाहती हूँ।
भानुकुँवरि इन बातों में दखल देना उचित न समझती थी;
नहीं .वह बदसूरत नहीं है, बहुत सुंदर है, वह परी है और
जायदाद जितनी है, वह पंचों से छिपी नहीं।
पर इस मानसिक अशांति में भी एक विचार पूर्णरुप से
मुझे विश्वास है कि तुम उसी तरह इस भार को सँभाले रहोगे।
पले-बड़े, मीनू.
चार आदमी कार से उतरे और कुर्सियाँ और चित्रण बोर्ड उतारने लगे।
इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे.
कैसे कर्म-शील थे;
इसलिए मैंने व्यर्थ कष्ट देना मुनासिब न समझा।
लंदन में मोहनदास गांधी पूरी तरह
वीरों ने है प्राण गँवाए
खूब रकाबियाँ माँजी, खूब प्याले धोये।
का सपना बिखर गया था.
उसे कुछ आता ही नहीं था।
शिक्षक ने पूछा, 'पर क्या उस समय आओगे जब बच्चे यहाँ हों?'
आठ वर्ष तक तन-मन से स्वामी के संतान की सेवा की।
वे बहुत करेंगी तो अपने रुपये ले लेंगी और क्या कर सकती हैं?
जुम्मन बोले-पंचों का हुक्म अल्लाह का हुक्म है।
उस दौर में मोहनदास गांधी
वह बाजार में निकलते तो दूकानदारों में
'जी सर, इंटरव्यू का ऑडिशन यही हो रहा है?' मीनू ने काउंटर पर बैठे आदमी से कहा।
केवल चमारों का कोलाहल सुनायी देता था।
बारिश होते ही चाची को ज़ोर-ज़ोर से गाना अच्छा लगता है।